अनिल विस्वास

#07july
#31may
अनिल विस्वास
🎂07 जुलाई 1914,
बरिसल, बांग्लादेश
⚰️ 31 मई 2003,
नई दिल्ली
पत्नी: मीना कपूर (विवा. 1959–2003), आशालता विश्वास (विवा. 1936–1954)
नातिन या पोती: पारोमिता वोहरा
बच्चे: शिखा वोहरा, उत्पल बिस्वास, अमर विश्वास, अमित विश्वास,

अनिल बिस्वास
बॉलीवुड के प्रसिद्ध संगीतकार थे। हिन्दी फ़िल्मों के गीत-संगीत के स्वर्ण-युग के सारथी अनिल बिस्वास रहे हैं। उन्होंने न सिर्फ अपने संगीत से फ़िल्म संगीत को शास्त्रीय, कलात्मक और मधुर बनाया बल्कि अनेक गायक-गायिकाओं को तराशकर हीरे-जवाहरात की तरह प्रस्तुत किया। इनमें तलत महमूद, मुकेश, लता मंगेशकर, सुरैया के नाम प्रमुखता से गिनाए जा सकते हैं। अनिल बिस्वास शास्त्रीय संगीत के निष्णात होने के साथ लोक-संगीत के अच्छे जानकार थे। उनकी धुनों में जो संगीत है, वह अब हमारी विरासत बन गया है।

जीवन परिचय

अनिल बिस्वास का जन्म बारीसाल, पूर्वी बंगाल में 7 जुलाई, 1914 को हुआ था, जो अब बांग्लादेश है। वे स्वतंत्रता संग्राम में भी शामिल हुए और बंगाल के महान् कवि और संगीतकार काज़ी नज़रुल इस्लाम के भी संपर्क में रहे। वे काफ़ी कम उम्र में कोलकाता चले आए और उसके बाद वहाँ से 1934 में मुंबई चले गए। मुंबई की फ़िल्मी दुनिया में आकर उन्होंने देखा कि यहाँ तो हर प्रांत का संगीत मौजूद है। अनिल दा ने अपने प्रयत्नों से इसे और अधिक विस्तार दिया। मुंबई पहुँचते ही उन्हें 'धर्म की देवी' नाम की फ़िल्म में संगीत देने का अवसर मिला और उसके बाद यह सिलसिला बरसों तक चलता रहा।

'दिल जलता है तो जलने दे...' से मुकेश ने अपने करियर की शुरूआत की और उसके बाद अनेक हिट गाने गए। अनिल बिस्वास को हिंदी फ़िल्म संगीत में पहली बार ऑर्केस्ट्रा का इस्तेमाल करने का श्रेय भी दिया जाता है। 1949 में उन्होंने तलत महमूद से आरज़ू फ़िल्म में पहली बार गाना गवाया जो सुपरहिट रहा--'ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल.

स्व अनिल बिस्वास अपनी पत्नी के साथ घर में मजे से कुछ पका रहे हैं और स्व लता मंगेशकर बगल में बैठे हुए ध्यान से देख रही हैं, कोयले की सिगड़ी जल रही है, डालडे का डिब्बा रखा हुआ है

अनिल बिस्वास का लता, तलत महमूद और दिलीप कुमार से पारिवारिक संबंध था।
ये संगीतकार होने के साथ मजबूत कद काठी के अत्यंत ताकतवर और पहलवान किस्म के आदमी थे।
कलकत्ता से मुंबई आए अनिल दा का सफर फिल्म जगत में सिर्फ 26 साल रहा। 1961 में बीस दिनों में छोटे भाई सुनील और बड़े बेटे के निधन ने अनिल दा को भीतर से तोड़ दिया।
वे मुंबई से दिल्ली चले गए और मृत्युपर्यंत साउथ एक्सटेंशन में रहे। यहाँ रहते हुए भी उन्होंने आकाशवाणी को अपनी सेवाएँ दीं और "हम होंगे कामयाब एक दिन" जैसा गीत युवा पीढ़ी को दिया। इस गीत की शब्द रचना में उन्होंने कवि गिरिजा कुमार माथुर से सहयोग किया था।

अनिल बिस्वास की पत्र-पत्रिका और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चर्चा 1994 में हुई, जब म.प्र. शासन के संस्कृति विभाग ने उन्हें लता मंगेशकर अलंकरण से सम्मानित किया। लता मंगेशकर अपने गायन के आरंभिक चरण में गायिका नूरजहाँ से प्रभावित थीं। अनिल दा ने लता को इस 'प्रेत बाधा' से मुक्ति दिलाकर शुद्ध-सात्विक लता मंगेशकर बनाया। अनिल दा के संगीत में लताजी के कुछ उम्दा गीतों की बानगी देखिए- मन में किसी की प्रीत बसा ले (आराम), बदली तेरी नजर तो नजारे बदल गए (बड़ी बहू), रूठ के तुम तो चल दिए (जलती निशानी)।

स्वयं लताजी ने इस बात को स्वीकार किया है कि अनिल दा ने उन्हें समझाया कि गाते समय आवाज में परिवर्तन लाए बगैर श्वास कैसे लेना चाहिए। यह आवाज तथा श्वास प्रक्रिया की योग कला है। अनिल दा उन्हें लतिके कहकर पुकारते थे। इसी तरह मुकेश को सहगल की आवाज के प्रभाव से मुक्त कराकर उसे मुकेशियाना शैली प्रदान करने में अनिल दा का हाथ है।

तलत महमूद की मखमली आवाज पर अनिल दा फिदा थे। तलत की आवाज के कम्पन और मिठास को अनिल दा ने रेशम-सी आवाज कहा था। किशोर कुमार से फिल्म 'फरेब' (1953) में अनिल दा ने संजीदा गाना क्या गवाया, आगे चलकर इस शरारती तथा नटखट गायक के संजीदा गाने देव आनंद-राजेश खन्ना के प्लस-पाइंट हो गए।
संगीतकार नौशाद ने कहा था "अनिल बिस्वास एकमात्र ऐसे बंगाली संगीतकार हैं, जो पंजाबी फिल्म में पंजाबी, गुजराती फिल्म में गुजराती, मुगल फिल्म में मुगलिया संगीत देने में माहिर हैं। वे कीर्तन, जत्रा और रवीन्द्र संगीत के अलावा भी हिन्दुस्तानी संगीत को बखूबी जानते हैं "
अनिल विश्वास का जन्म बरीसाल (पूर्वी बंगाल) में 7 जुलाई 1914 को हुआ था। चार साल की उम्र से वे गाने लगे थे। किशोर उम्र में देशभक्ति जागी और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। जेल गए और यातनाएँ सही। 16 साल की उम्र में नवंबर 1930 में कलकत्ता में महान बाँसुरी वादक पन्नालाल घोष के घर शरण ली। अनिल दा की बहन पारुल घोष ने पन्नालालजी से विवाह रचाया था। युवा अनिल ने यहाँ ट्यूशनें की।

काजी नजरूल इस्लाम के कहने पर मेगा फोन रिकॉर्ड कंपनी में काम किया। उनका पहला रिकॉर्ड उर्दू में जारी हुआ था। यहीं पर उनकी मुलाकात कुंदनलाल सहगल और सचिन देव बर्मन से हुई थी। हीरेन बोस के साथ मुंबई आए और 26 साल संगीत सृजन किया। अभिनेत्री मीना कपूर से उन्होंने शादी की थी।

अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन की पहली फिल्म 'धर्म की देवी' (1935) थी और अंतिम 'छोटी-छोटी बातें'(1965)।
इसे अभिनेता मोतीलाल ने बनाया था। अनिल विश्वास संगीत को स्वतंत्र पहचान देने वाले प्रथम संगीतकार हैं।
"आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है/ दूर हटो, दूर हटो, दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिन्दुस्तान हमारा है'  भारत की आजादी के 4 साल पहले देशभक्ति का यह तराना गली-गली गूँजा था। बच्चे-बच्चे की जबान पर था। फिल्म किस्मत (1943) के इस गीत को बड़नगर (म.प्र.) के गीतकार कवि प्रदीप ने लिखा था और पूर्वी बंगाल के संगीतकार अनिल बिस्वास ने जोशीले संगीत से सँवारा था। इस गीत को सुनकर देशभक्तों की रगों में खून की रफ्तार तेज हो जाती थी

कार्यक्षेत्र

कलकत्ता से मुंबई आए अनिल दा का सफर फ़िल्म जगत् में सिर्फ 26 साल रहा। 1961 में बीस दिनों में छोटे भाई सुनील और बड़े बेटे के निधन ने अनिल दा को भीतर से तोड़ दिया। वे मुंबई से दिल्ली चले गए और मृत्युपर्यंत साउथ एक्सटेंशन में रहे। यहाँ रहते हुए भी उन्होंने आकाशवाणी को अपनी सेवाएँ दीं और 'हम होंगे कामयाब एक दिन' जैसा कौमी तराना युवा पीढ़ी को दिया। इस गीत की शब्द रचना में उन्होंने कवि गिरिजाकुमार माथुर से सहयोग किया था। अनिल बिस्वास की पत्र-पत्रिका और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चर्चा 1994 में हुई, जब मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग ने उन्हें लता मंगेशकर अलंकरण से सम्मानित किया। लता मंगेशकर अपने गायन के आरंभिक चरण में गायिका नूरजहाँ से प्रभावित थीं। अनिल दा ने लता को इस 'प्रेत बाधा' से मुक्ति दिलाकर शुद्ध-सात्विक लता मंगेशकर बनाया। अनिल दा के संगीत में लताजी के कुछ उम्दा गीतों की बानगी निम्नलिखित गीतों में सुनी जा सकती है-

मन में किसी की प्रीत बसा ले (आराम)
बदली तेरी नज़र तो नज़ारे बदल गए (बड़ी बहू)
रूठ के तुम तो चल दिए (जलती निशानी)।

लोकप्रियता

'आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है दूर हटो, दूर हटो, दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिन्दुस्तान हमारा है'।

भारत की आजादी के 4 साल पहले देशभक्ति का यह तराना गली-गली गूँजा था। बच्चे-बच्चे की जबान पर था। फ़िल्म किस्मत (1943) के इस गीत को बड़नगर (मध्य प्रदेश) के गीतकार कवि प्रदीप ने लिखा था और पूर्वी बंगाल के संगीतकार अनिल बिस्वास ने जोशीले संगीत से सँवारा था। इस गीत को सुनकर देशभक्तों की रगों में ख़ून की रफ्तार तेज हो जाती थी।

संगीत के पितामह

हिंदी सिने संगीत के पितामह कहे जाने वाले दादा अनिल बिस्वास की सबसे बड़ी ख़ासियत थी उनका ज्ञान और उनका समर्पण। उन्‍होंने ऐसा कोई गाना नहीं बनाया जो उनकी मरज़ी के ख़िलाफ़ हो। अनिल बिस्वास की संगीत-यात्रा पर कुबेर दत्‍त की एक महत्‍त्‍वपूर्ण पुस्‍तक भी आई है। अनिल दा ही वो संगीतकार हैं जिन्‍होंने तलत महमूद को विश्‍वास दिलाया कि उनकी आवाज़ की लरजिश ही उनकी दौलत है। अनिल दा ही वो संगीतकार हैं जिन्‍होंने डांट-डपटकर कई प्रतिभाओं को संवारा और लता मंगेशकर भी उन्‍हीं प्रतिभाओं में से एक हैं। लता जी बड़े ही सम्‍मान के साथ अनिल बिस्‍वास का ज़िक्र करती हैं। स्वयं लताजी ने इस बात को स्वीकार किया है कि अनिल दा ने उन्हें समझाया कि गाते समय आवाज़ में परिवर्तन लाए बगैर श्वास कैसे लेना चाहिए। यह आवाज़ तथा श्वास प्रक्रिया की योग कला है। अनिल दा उन्हें लतिके कहकर पुकारते थे। इसी तरह मुकेश को सहगल की आवाज़ के प्रभाव से मुक्त कराकर उसे मुकेशियाना शैली प्रदान करने में अनिल दा का हाथ है। तलत महमूद की मखमली आवाज़ पर अनिल दा फिदा थे। तलत की आवाज़ के कम्पन और मिठास को अनिल दा ने रेशम-सी आवाज़ कहा था। किशोर कुमार से फ़िल्म 'फरेब' (1953) में अनिल दा ने संजीदा गाना क्या गवाया, आगे चलकर इस शरारती तथा नटखट गायक के संजीदा गाने देव आनंद और राजेश खन्ना के प्लस-पाइंट हो गए।

प्रतिभाओं की प्रतिस्पर्धा

अनिल बिस्वास के दौर में एक से बढ़कर एक संगीतकार रहे। इसका लाभ यह हुआ कि संगीतकारों की स्वस्थ स्पर्धा के चलते श्रोताओं को मधुर से मधुरतम गीत मिले। उस दौर में नरेन्द्र शर्मा, कवि प्रदीप, गोपालसिंह नेपाली, इंदीवर, डी.एन. मधोक जैसे गीतकार भी हुए, जिनके गीत कविता की तरह भावपूर्ण और सार्थक होते थे। नौशाद, रोशन, मदन मोहन, सचिन देव बर्मन, सज्जाद, ग़ुलाम हैदर, वसंत देसाई, हेमंत कुमार, शंकर-जयकिशन और खय्याम जैसे संगीतकारों के तालाब में अनिल दा सदैव कमल की भाँति रहते हुए सबका मार्गदर्शन करते रहे। सी.

रामचंद्र अपने को अनिल दा का शिष्य मानते थे। ये तमाम संगीतकार एक-दूसरे की इज्जत करते हुए फ़िल्म-संगीत के खजाने में अपना विनम्र योगदान करते रहे।

सम्मान और पुरस्कार

1986 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

निधन

अनिल बिस्वास का दिल्ली में 31 मई, 2003 को निधन हो गया। वे 89 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे।

🎥

धरम की देवी (1935)
फ़िदा-ए-वतन (उर्फ तस्वीर-ए-वफ़ा ) (1935, झंडे ख़ान के साथ सह-संगीतकार )
पिया की जोगन (उर्फ खरीदी हुई दुल्हन )
प्रतिमा (उर्फ प्रेम मूर्ति )
प्रेम बंधन (उर्फ प्रेम के शिकार ) (1936, झंडे खान के साथ सह-संगीतकार )
संगदिल समाज
शेर का पंजा
शोख दिलरुबा (1936, सुंदर दास के साथ)
बुलडॉग (1936)
दुखियारी (उर्फ निस्वार्थ प्रेम की कहानी ) (1936, मधुलाल दामोदर मास्टर के साथ)
जेंटलमैन डाकू (1937)
जागीरदार (1937)
कोकिला (1937)
महागीत (1937)
वतन (1938)
तीन सौ दिन के बाद (1938)
हम तुम और वो (1938)
ग्रामोफोन सिंगर (1938)
डायनामाइट (1938)
अभिलाषा (1938)
जीवन साथी (1939)
एक ही रास्ता (1939)
पूजा (1940)
औरत (1940)
अलीबाबा (1940/I)
अपना पराया (1941)
बहन (1941)
आसरा (1941)
विजय (1942)
जवानी (1942)
किस्मत (1943)
हमारी बात (1943)
ज्वार भाटा (1944)
पहली नज़र (1945)
भूख (1947)
मंझधार (1947)
वीणा (1948)
गजरे (1948)
अनोखा प्यार (1948)
लाडली (1949)
जीत (1949)
गर्ल्स स्कूल (1949)
बेकसूर (1950)
आरज़ू (1950)
लाजवाब (1950)
तराना (1951)
दो सितारे (1951)
आराम (1951)
दो राहा (1952)
राही (1952)
मेहमान (1953)
जलियाँवाला बाग की ज्योति (1953)
फ़रेब (1953)
आकाश (1953)
वारिस (1954)
नाज़ (1954)
महात्मा कबीर (1954)
मान (1954)
जासूस (1957)
जलती निशानी (1955)
फरार (1955)
डु-जने (1955)
पैसा ही पैसा (1956)
हीर (1956)
परदेसी (1957 फ़िल्म) (1957)
अभिमान (1957)
संस्कार (1958)
चार दिल चार राहें (1959)
मिस्टर सुपरमैन की वापसी (उर्फ मिस्टर सुपरमैन की वापसी ) (1960)
अंगुलिमाल (1960)
सौतेला भाई (1962)
छोटी छोटी बातें (1965)

Comments

Popular posts from this blog

अंत माने

पृथ्वी राज कपूर (मृत्यु)

असित सेन