विनोद एरिक रॉबर्ट्स 🎂28 मई1922
विनोद एरिक रॉबर्ट्स 🎂28 मई 1922 ⚰️25 दिसंबर 1959
एरिक रॉबर्ट्स
28 मई 192225 दिसंबर 1959
लाहौर, पाकिस्तान, ब्रिटिश भारत
मृत्यु
25 दिसंबर 1959 (आयु 37)
मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
सक्रिय वर्ष
1946–1962 (1959 में उनकी मृत्यु के बाद उनके संगीत वाली 3 फ़िल्में रिलीज़ हुईं)
जीवनसाथी
शीला बेट्टी
बच्चे
वीना सोलोमन
वीरा मिस्त्री
विनोद 1950 के दशक के एक प्रसिद्ध भारतीय फिल्म संगीत निर्देशक थे। 1949 में, उन्होंने फिल्म एक थी लड़की में मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर द्वारा गाए गए एक हिट पंजाबी फिल्म गीत लारा लप्पा लारा लप्पा लाई रखड़ा की रचना की। विनोद का असली नाम एरिक रॉबर्ट्स था; विनोद बॉम्बे फिल्म उद्योग द्वारा दिया गया एक पेशेवर नाम था।
विनोद का जन्म 28 मई 1922 को लाहौर में एरिक रॉबर्ट्स के रूप में हुआ था। जब विनोद एक बच्चा था, तो वह पंजाबी हिंदू शादियों में बजाए जाने वाले संगीत से मोहित हो गया था। विनोद लाहौर के संगीत निर्देशक पंडित अमर नाथ के छात्र थे। साल की उम्र में, उनकी पहली आधिकारिक रिकॉर्ड रचना जारी की गई, सामने आएगा कोई जलवा दिखाएगा कोई।
फोर्टिस के कई गाने बहुत मशहूर हुए इतने कि हम आज भी गुनगुनाते हैं और यहां में उन गानों की बात कर रही हूं जिनसे कुछ बहुत बडे बडे नाम नहीं जुड़ा है बस वह गाने आज भी लोगों को याद है जैसे कि ये गाना लारा लप्पा लारा लप्पा रखा था
इस गाने के सिंगल्स के नाम शायद आप लोगों को याद होंगे मगर बहुतों को फिल्म का नाम भी याद नहीं होगा
यह गाना है उनमें सौ उनचास में आई फिल्म एक थी लड़की का बहुत से लोगों ने इसे छिछोरा गाना कहा यह भी कहा कि ये गाना लता मंगेशकर के स्तर का नहीं है लेकिन सच्चाई यह है कि ये गाना उस वक्त भी बहुत पॉपुलर हुआ था और आज तक लोग इसे नहीं भूले हैं
इस गीत के संगीतकार को भुला दिया गया है
इस गीत का संगीत दिया था संगीतकार विनोद ने यह भी मुमकिन है बहुत से लोग ये नाम पहली बार सुन रहे हो और विनोद उन संगीतकारों में से थे जिनके पास टैलेंट तो था शायद किस्मत के सितारे उतने बुलंद नहीं थे
धन खर्च होगा
में है
विनोद का असली नाम था एरिक रॉबर्ट्स उनका जन्म अट्ठाईस मई उन्नीस दो बाईस को लाहौर में हुआ अब हम जहां रहते हैं वहां के माहौल का असर तो हम सब पर पड़ता है विनोद भी जब छोटे थे तो लाहौर में होने वाली शादियों को हैरत से देखते थे उन शादियों में जो बैंड बचता था
म्यूजिक होता था वो उन्हें बहुत लुभाता था वो असल में पंजाबी थे उन्हें लाहौर के गुरुद्वारे में होने वाला शबद कीर्तन भी बहुत फास्ट सीनेट करता था इसी माहौल ने उन्हें संगीत की तरफ खींचा बाद में उन्होंने पंडित अमरनाथ से संगीत सीखा जुला हॉरर फिल्म इंडस्ट्री में म्यूजिक डायरेक्टर थे
उनसे विनोद ने संगीत की बारीकियां सीखी और ध्वनि कंपोज करना शुरू कर दिया
सत्रह साल की उम्र में उनका पहला रिकॉर्डिग गाना आया सामने आएगा कोई जलवा दिखायेगा कोई ये गाना बहुत पॉपुलर हुआ था
विनोद पियानो बजाने में माहिर थे और फिल्मों में आने से पहले लाहौर के एक बड़े होटल में प्रोफेशनली पियानो बजाया करते थे
हॉटेल में फिल्म इंडस्ट्री की हस्तियां भी आया करती थी
वहीं धूप किशोरी उनके पियानोवादक से काफी प्रभावित हुए और उन्हें अपनी फिल्मों में संगीत देने के लिए राजी कर लिया
उन्होंने ही एरिक रॉबर्ट्स को विनोद नाम दिया उन्हें सौ छियालीस में विनोद ने खामोश निगाहें फिल्म में ग्यारह गाने कंपोज किए जिन्हें अजीज कश्मीरी ने लिखा था
कश्मीरी के साथ बाद में भी विनोद ने कई खूबसूरत गीत लिए कहते हैं कि पंडित अमरनाथ की मौत होने के बाद जो फिल्म अधूरी रह गई थी कई फिल्ममेकर्स ने उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी विनोद को सौंपी थी
उस दौर में आई पर बस में तारा जैसी फिल्मों का संगीत कुछ खास नहीं रहा लेकिन उन्हें सौ अड़तालीस में आई चमन म्यूजिकल हिट साबित हुई
लता मंगेशकर ने अपने शुरुआती करियर में जिन पंजाबी फिल्मों में आवाज दी थी जर्मन उनमें से एक है
विभाजन के समय जब बहुत सी हस्तियां लाहौर से मुंबई रवाना हुई तब विनोद अपनी पत्नी शीला और छोटी सी बेटी रीना के साथ दिल्ली आ गए थे
उधर रूप किशोरी मुंबई पहुंचे और जब उन्होंने फिल्म निर्माण शुरू किया तो विनोद को भी वहां बुला लिया उस समय जो फिल्म बना रहे थे
इसी फिल्म से विनोद में कामयाबी की उड़ान भरी ये फिल्म थी एक थी बात आते थे
इंग्लैंड रहते हैं अर्थात अट्ठारह
एक लडकी का गाना उस समय इतना मशहूर हुआ था कि फिल्म की हिरोइन मीणा शोरी इस गाने के कारण रातों रात मशहूर हो गई थी
लता मंगेशकर सतीश बत्रा और मोहम्मद रफी की आवाजों से सजा यह गाना गली गली में गूंजता था
आज भी बहुत से लोग यह मानते हैं कि इस गाने में जी एम दुर्रानी की आवाज है क्योंकि एचएमवी ने अपने एलपी रिकॉर्ड्स सेवेंटी एक आरपीएम पर गलती से जी एम दुर्रानी का नाम छाप दिया था मगर खुद जी एम दुर्रानी ने एक फिल्म हिस्टोरियन को बताया था कि इसमें उनकी आवाज नहीं है उसके बाद एचएमवी ने
भी सतीश बत्रा का नाम देना शुरू कर दिया
इस थी लड़की के गाने में विनोद भी स्क्रीन पर दिखाई देते हैं
अब आप गाना सुनें है जिसके बोलर दिल्ली से आए भारतेंदु इस दौर में आई कामिनी और नागिन फिल्म तो ठीक ठाक रहीं लेकिन उनके बाद आई अनमोल रतन का म्यूजिक लांच जवाब था
है
उन्नीस सौ अड़तालीस से लेकर उन्हें सौ तिरेपन तक संगीत का विनोद ने करीब छत्तीस फिल्मों में संगीत या यूं तो विनोद अलग अलग बैनर्स के साथ काम कर रहे थे रेट थी लडकी के बाद जैसे वो शोरी फिल्म्स के परमानेंट संगीतकार बन गए थे
मुखड़ा आग का दरिया एक दो तीन और जलवा जैसी कई फिल्मों में विरोध में संगीत दिया पंवार ने प्रण ले लिया
अपने नाम लिखवा रहे हैं
में
में में
सही समय पर सही लोगों का साथ मिल जाए तो आपके टैलेंट को दुनिया देखती है और शायद इसी को किस्मत कहते हैं
विनोद के साथ विडम्बना यही रही कि उन्हें सही फिल्में नहीं मिली
एक वक्त के बाद उनका म्यूजिक ज्यादातर हास्य फिल्मों में जाया हो गया लाडला ऊट पटांग श्री नकद नारायण मक्खीचूस शेख चिल्ली जैसी फिल्मों के गानों ने वक्ती लोकप्रियता तो पाई पर वह गाने यादगार नहीं बन पाए ऐसी फिल्मों में ज्यादा गुंजाइश नहीं होती इसीलिए विनोद
संगीत आज के दौर में अनसुना ही है
रोजाना रहे हैं
उस दौर में उन्होंने कुछ एक ऐतिहासिक सामाजिक फिल्में भी जिनमें कुछ गाने बहुत अच्छे बन पड़े थे पर उनसे विनोद के करियर को कोई खास फायदा नहीं पहुंचा
भी
पुणे में सेंटर वाली जैसी फिल्में भी की
इस वक्त तक उन्हें मिलने वाली फिल्में कम होती गई और फिर वक्त ने इजाजत नहीं दी विनोद को शेयर करते हुए प्लेट लगने से इन्फेक्शन हुआ था लेकिन जब तक वह हॉस्पिटल गए वो इंफैक्शन लाइलाज हो चुका था वह कोमा में चले गए थे और फिर पच्चीस दिसंबर उन्नीस सौ उनसठ को सिर्फ सैंतीस साल की उम्र
में वो इस दुनिया से रुखसत हो गए
बहुत से लोग विनोद को वन सॉन्ग वंडर कहते हैं मगर ऐसा नहीं है उन्होंने बहुत से अच्छे गाने दिए
लोगों तक पहुंचे नहीं और जो पहुंचे
याद नहीं रहे हां ये सच है कि विनोद का नाम इस गीत से फिल्म इतिहास में अमर हो गया
बूम बूम बूम बूम बूम
🎥
01 खामोश निगाहें (1946)
02 पराए बस में (1946) (नियाज़ हुसैन के साथ)
03 कामिनी (फिल्म) (1946)
04 चमन (फ़िल्म) (1948) (पंजाबी)
05 एक थी लड़की (1949)
06 तारा (फिल्म) (1949)
07 अनमोल रतन (1950)
08 भैया जी (1950) (पंजाबी)
09 वफ़ा (1950) (बुलो सी रानी के साथ)
10 मुटियार (1950) (पंजाबी)
11 बुलबुल (1951 फ़िल्म) (1951)
12 केवल महिलाओं के लिए (फ़िल्म) (1951) (तितली)
13 मुखरा (1951)
14 सब्ज़ बाग़ (1951) (गुलशन सूफ़ी के साथ)
15 सलोनी (फिल्म) (1951)
16 अमर शहीद (1952) (वसंत देसाई के साथ)
17 आग का दरिया (1953)
18 एक दो तीन (1953)
19 अष्टल्ली (1954) (पंजाबी)
20 लाडला (1954)
21 रम्मन (फिल्म) (1954)
22 हा हा हा हाय हाय हू हू (1954)
23 जलवा (फिल्म) (1955)
24 ऊटपटांग (1955)
25 श्री नक़द नारायण (1955)
26 माखी चूज़ (1956)
27 मिस 56 (1956 में पाकिस्तान में पाकिस्तानी संगीतकार जी.ए. चिश्ती (बाबा चिश्ती) के साथ और 1958 में भारत में मिस 58)
28 शेख चिल्ली (1956)
29 गरम गरम (1957)
30 मुमताज महल (फिल्म) (1957)
31 निक्की (1958) (पंजाबी)
32 मिस हंटरवाली (1959)
33 देखी तेरी बंबई (1961)
34 एक लड़की सात लड़के (1961) एस मोहिंदर के साथ
35 रंग रलियां (1962) (लच्छी राम और मुखर्जी के साथ)
नोट: विनोद की आखिरी तीन फ़िल्में उनकी मृत्यु के बाद रिलीज़ हुईं।
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